उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने न्याय व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पीपरपुर थाना क्षेत्र में सड़क हादसे में एक महिला की मौत के 17 दिन बाद भी आरोपी के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई न होने का आरोप लगाते हुए पीड़ित परिवार इंसाफ की गुहार लगा रहा है। इतना ही नहीं, परिजनों का दावा है कि उन्हें लगातार धमकियां भी दी जा रही हैं।
मामला पीपरपुर थाना क्षेत्र के दुर्गापुर (भेंवई) गांव का है। यहां रहने वाली दुखना पत्नी रोंघे लाल की 30 मई 2026 को एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। परिजनों के अनुसार, गांव का ही एक व्यक्ति अपनी बोलेरो गाड़ी को कथित रूप से लापरवाही से और जानबूझकर पीछे कर रहा था। इसी दौरान वाहन दुखना के ऊपर चढ़ गया, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गईं।
घटना के तुरंत बाद उन्हें उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। महिला की मौत के बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। परिजनों ने तत्काल पुलिस को सूचना देकर शिकायत दर्ज कराई और आरोपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
हालांकि, मृतका के पति रोंघे लाल और अन्य परिवारजनों का आरोप है कि घटना के 17 दिन बीत जाने के बावजूद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं की। उनका कहना है कि शिकायत दर्ज होने के बाद भी जांच की गति बेहद धीमी है, जिससे आरोपी पक्ष के हौसले बुलंद हो गए हैं।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि अब उन्हें समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा है और विरोध करने पर लगातार धमकियां दी जा रही हैं। परिजनों का कहना है कि वे भय और असुरक्षा के माहौल में जीवन जीने को मजबूर हैं। उन्होंने प्रशासन से निष्पक्ष जांच कर दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
परिवार ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें जल्द न्याय नहीं मिला तो वे उच्च अधिकारियों से शिकायत करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर आंदोलन का रास्ता भी अपनाएंगे। उनका कहना है कि एक गरीब परिवार की आवाज को अनसुना नहीं किया जाना चाहिए और दोषियों को कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए।
फिलहाल इस मामले में पुलिस का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है। ऐसे में स्थानीय लोगों की नजरें अब अमेठी पुलिस की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और पीड़ित परिवार को कब तक न्याय मिल पाता है।
यह मामला केवल एक सड़क हादसे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सवालों को भी सामने लाता है कि आखिर पीड़ित परिवारों को न्याय पाने के लिए कितनी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है और शिकायत के बाद कार्रवाई में देरी क्यों होती है।