बाराबंकी संवाददाता :- उस्मान चौधरी
बाराबंकी जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल – रफ़ी अहमद किदवाई जिला चिकित्सालय – इन दिनों बदहाली और लापरवाही का केंद्र बन चुका है। स्वास्थ्य मंत्री की सख्त निर्देशों और पर्याप्त बजट के बावजूद अस्पताल की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। टॉयलेट की बदबू से लेकर ऑक्सीजन पॉइंट के खराब होने तक, मरीजों की सुरक्षा और सुविधा दोनों ही बोझिल हालात में नजर आती हैं। सवाल उठता है कि जब बजट और आदेश दोनों मौजूद हैं, तो फिर इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कौन?
बाराबंकी का जिला अस्पताल, जो स्वास्थ्य सेवाओं का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है, इन दिनों अपनी जर्जर व्यवस्था और अनदेखी के कारण सुर्खियों में है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के हजारों मरीज रोजाना यहाँ पहुंचते हैं, लेकिन व्यवस्थाएँ इतनी खराब हैं कि अस्पताल किसी जर्जर भवन से अधिक नहीं लगता। मरीजों की बुनियादी सुविधाएँ, स्वच्छता और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण पहलू यहां पूरी तरह उपेक्षित दिखाई देते हैं।

टॉयलेट और बाथरूम की भयावह स्थिति
सबसे ज्यादा शिकायतें अस्पताल के टॉयलेट और बाथरूमों को लेकर हैं। यहां प्रवेश करते ही तेज बदबू के कारण सांस लेना मुश्किल हो जाता है। फर्श गंदे, दीवारें गंदी और वेंटिलेशन की कोई व्यवस्था नहीं। मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक है, खासकर उनको जो सांस से जुड़ी बीमारियों से पीड़ित हैं। कई लोग तो अंदर जाते ही बिना इस्तेमाल किए वापस लौट आते हैं।

अस्पताल के कई वार्डों में ऑक्सीजन पॉइंट और स्विच बोर्ड लंबे समय से खराब पड़े हैं। गंभीर मरीजों को ऑक्सीजन देने के लिए नर्सें उन्हें एक कमरे से दूसरे कमरे में शिफ्ट करती हैं। एक छोटी सी तकनीकी सुविधा की कमी किसी भी समय मरीज की जान के लिए खतरा बन सकती है। अफसोस की बात यह है कि शिकायतों के बावजूद इन मरम्मत कार्यों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।

टूटी खिड़कियाँ और बढ़ता मच्छरों का खतरा
डेंगू और मलेरिया जैसे संक्रमण के बढ़ते खतरे के बीच अस्पताल को सुरक्षित और स्वच्छ बनाए रखना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके विपरीत, कई वार्डों की खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और जालियाँ भी फटी हुई हैं। इससे डेंगू वार्ड में भर्ती मरीज मच्छरों के सीधे संपर्क में आ जा रहे हैं। यह स्थिति इलाज के उद्देश्य को ही पूरी तरह विफल कर देती है। अस्पताल की दीवारों से उखड़ा प्लास्टर स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सालों से मरम्मत और पेंटिंग का काम नहीं हुआ।

बदरंग दीवारें, दरारें और सीलन अस्पताल के समग्र वातावरण को और निराशाजनक बना देती हैं। यह उपेक्षा जिम्मेदार अधिकारियों के निरीक्षण और कामकाज की खामियों को उजागर करती है। मुख्य गलियारों और परिसर में गंदगी, कचरा और थूक का अम्बार दिखाई देता है। सफाई कर्मचारियों की अनुपस्थित मानसिकता या निगरानी की कमी साफ झलकती है। मरीजों और परिजनों को बदबूदार और अस्वच्छ माहौल से गुजरना पड़ता है।

डेंगू वार्ड में ब्लोअर और लाइट की कमी
डेंगू और वायरल बुखार के बीच ठंड से बचाव बेहद जरूरी होता है। लेकिन अस्पताल के कई वार्डों में ब्लोअर उपलब्ध ही नहीं हैं, और जो रखे गए हैं वे खराब अवस्था में पड़े हैं। मरीजों को ठंड से कंपकंपाते हुए इलाज कराना पड़ रहा है। कुछ वार्डों में ट्यूबलाइट भी खराब हैं। कई मरीजों ने बताया कि कुछ कमरों में बिजली के बोर्ड ऐसे हैं जिनमें करंट आने का खतरा भी है।सीटी स्कैन विभाग में जहां रोज लंबी लाइनें लगती हैं, बैठने की सुविधा अत्यंत सीमित है। केवल एक कुर्सी उपलब्ध है, बाकी मरीज फर्श पर बैठकर इंतजार करते हैं। कई कमरे बंद पड़े हैं, जिन्हें अस्पताल स्टाफ गोदाम की तरह उपयोग कर रहा है। यह व्यवस्था मरीजों की गरिमा और सुविधा दोनों का उल्लंघन करती है।

अस्पताल प्रशासन सवालों के घेरे में
स्वास्थ्य मंत्री के कथन के अनुसार, बजट की कोई कमी नहीं है, फिर भी अस्पताल की व्यवस्था सुधर नहीं रही। सवाल उठता है कि क्या सीएमएस व्यवस्था संभालने में असफल हैं या फिर अस्पताल स्टाफ अपने मन से काम कर रहा है? विभागीय निरीक्षण और सरकारी आदेशों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
एक मरीज ने कहा— “हमको यहाँ ब्लोअर नहीं मिला। कई वार्डों में लाइट खराब है, और दो-एक वार्डों में करंट तक आता है। इस खतरे के बीच इलाज कौन करवाए?”

कब होगी ठोस कार्यवाई ?
अस्पताल की अव्यवस्था और लापरवाही का यह सिलसिला यह प्रश्न खड़ा करता है कि मरीजों की जान से यह खिलवाड़ कब रुकेगा। क्या प्रशासन कार्यवाई करेगा, या फिर मरीजों को इसी बदहाली में जीना पड़ेगा? ज़रूरत है कि तुरंत निरीक्षण, जवाबदेही और सुधारात्मक कदम उठाए जाएँ, ताकि बाराबंकी का जिला अस्पताल वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं का केंद्र बन सके |