भिंड संवादाता: आशिफ शाह
मौ नगर में चल रहे सड़क डिवाइडर निर्माण को लेकर स्थानीय लोगों में भारी नाराज़गी देखने को मिल रही है। मोहल्ले के लिए रास्ता न खोले जाने के विरोध में मंगलवार सुबह से बड़ी संख्या में महिलाएँ और पुरुष सड़क पर बैठकर धरना देने लगे। उनका आरोप है कि डिवाइडर निर्माण के चलते उनके घरों और गलियों का मुख्य मार्ग बंद हो गया है, जिससे दैनिक आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
धरने पर बैठे लोगों में कैलाशनारायण शर्मा, रमेश शर्मा, आलोक मिश्रा, हरिराम राठौर, बंटी जाटव, मायाराम जाटव, सोनू सक्सेना, हरिश्चंद जाटव, प्रदीप जाटव और प्रकाश सहित कई लोग शामिल रहे। स्थानीय निवासियों ने बताया कि वे पिछले कई दिनों से रास्ता खोले जाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी उनकी बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
स्थानीय निवासियों की शिकायत—“डिवाइडर बना तो सही, लेकिन हमारी ज़िंदगी ठप हो गई”

धरने में शामिल महिलाओं ने बताया कि सड़क डिवाइडर बनने से पहले भी कई बार अधिकारियों को सूचित किया गया था कि इस मार्ग से स्कूल जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों और नौकरी-पेशा लोगों का नियमित आवागमन होता है। लेकिन डिवाइडर निर्माण के दौरान इस बात का कोई ध्यान नहीं रखा गया।
एक महिला ने कहा,
“हमारे घरों से अस्पताल, बाज़ार और स्कूल जाने का यही एक रास्ता है। डिवाइडर से आने-जाने में दिक्कत तो होती ही है, लेकिन रास्ता ही बंद कर देना बहुत गलत है।”
कई लोगों ने बताया कि रोजमर्रा के काम जैसे दूध, दवा और सब्जियाँ लाने के लिए भी उन्हें लंबा चक्कर काटना पड़ रहा है। इससे न केवल समय बल्कि अतिरिक्त खर्च भी बढ़ गया है।
बिना वैकल्पिक मार्ग के निर्माण क्यों? स्थानीय अधिकारियों पर उठ रहे सवाल
मौ नगर के लोगों का कहना है कि डिवाइडर निर्माण से पहले किसी प्रकार की सार्वजनिक बैठक या सूचना नहीं दी गई। न ही वैकल्पिक मार्ग की व्यवस्था की गई। इससे यह प्रश्न उठ रहा है कि काम में इतनी जल्दबाज़ी क्यों की गई और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस समस्या पर गंभीरता क्यों नहीं दिखाई।
कैलासनारायण शर्मा ने कहा,
“हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास ऐसा भी हो जो लोगों की सुविधा को देखते हुए किया जाए। डिवाइडर से मोहल्ला कट गया है। कम से कम एक कट तो खुलवाया जाए ताकि लोगों को राहत मिल सके।”
धरने पर मौजूद रमेश शर्मा ने बताया कि प्रशासन को कई बार मौखिक और लिखित शिकायत दी गई, लेकिन अब तक न तो कोई अधिकारी मौके पर आया और न ही कोई समाधान की दिशा में कदम उठाया गया।
धरने में महिलाओं की बड़ी भागीदारी—“हम बच्चों की सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं”
धरने में बैठी महिलाओं की उपस्थिति खास रही। कई महिलाएँ अपने छोटे बच्चों के साथ वहीं पर बैठी रहीं। उनका कहना है कि सुबह और शाम बच्चों का स्कूल आना-जाना सबसे बड़ी समस्या है।
एक महिला ने कहा,
“जो रास्ता बंद हुआ है वही बच्चों की स्कूल बस का मार्ग था। अब बस भी मोहल्ले में नहीं आ पाती। हमें छोटे बच्चों को लेकर दूर तक जाना पड़ता है। यह पूरी तरह असुरक्षित है।”
स्थानीय व्यापारियों को भी हो रही है परेशानी
मौ नगर के दुकानदारों का कहना है कि डिवाइडर निर्माण के बाद से उनके व्यापार पर सीधा असर पड़ा है।
सोनू सक्सेना ने कहा,
“ग्राहक हमारी दुकानों तक पहुँच नहीं पा रहे। रास्ता बंद होने से लोग दूसरी ओर से बाज़ार जाने लगे हैं। हमारी बिक्री 30–40% तक घट गई है।”
व्यापारियों ने भी प्रशासन से तुरंत समाधान निकालने की मांग की।
धरने की सूचना मिलते ही पुलिस पहुँची, आश्वासन दिया गया
धरना प्रदर्शन की जानकारी मिलते ही स्थानीय पुलिस टीम मौके पर पहुँची और लोगों की समस्याएँ सुनीं। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया कि उनकी शिकायत उच्च अधिकारियों तक पहुँचाई जाएगी और समाधान की कोशिश की जाएगी।
हालाँकि प्रदर्शनकारी अभी भी प्रशासन से लिखित आश्वासन और स्पष्ट समयसीमा चाहते हैं।
लोग बोले—अगर रास्ता नहीं खुला तो आंदोलन होगा तेज़
प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कहा कि यदि जल्द ही रास्ता नहीं खोला गया तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करने को बाध्य होंगे। उनका कहना है कि यह केवल सुविधा का नहीं, बल्कि सुरक्षा का मुद्दा है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।
कई लोगों ने कहा कि यह धरना अहिंसात्मक और शांतिपूर्ण है, लेकिन उनकी पीड़ा गंभीर है। वे किसी बड़ी दुर्घटना या परेशानी का इंतज़ार नहीं कर सकते।
प्रशासन का पक्ष अभी नहीं आया सामने
इस पूरे मामले पर संबंधित विभाग या नगरपालिका के किसी अधिकारी का आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लोगों का कहना है कि वे प्रशासन से बस इतना चाहते हैं कि कम से कम एक कट खोल दिया जाए ताकि मोहल्ले के लोग आसानी से आवागमन कर सकें।
मौ नगर में सड़क डिवाइडर निर्माण को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब जनआंदोलन का रूप लेता जा रहा है। दैनिक जीवन में अचानक आई इस बाधा ने लोगों को सड़क पर बैठने को मजबूर कर दिया है। अब देखना यह है कि प्रशासन कब और कैसे इस समस्या का समाधान करता है और क्या स्थानीय लोगों की मांग को पूरा किया जाता है।