मेरठ संवाददाता :- शाहिदीन मलिक
मेरठ में एसआईआर अभियान के दौरान बीएलओ (BLO) के रूप में तैनात सिंचाई विभाग के लिपिक मोहित चौधरी द्वारा कथित रूप से ज़हर खाने का मामला सामने आया है। परिवार का आरोप है कि अत्यधिक काम के दबाव, धमकियों और उचित ट्रेनिंग न मिलने की वजह से मोहित मानसिक तनाव में थे। घटना के बाद अस्पताल में अफसरों के खिलाफ परिजनों व स्थानीय लोगों ने हंगामा भी किया। फिलहाल मोहित की हालत गंभीर बताई जा रही है।
मेरठ में बीएलओ ड्यूटी के दौरान काम के अत्यधिक दबाव और तनाव के चलते एक कर्मचारी द्वारा ज़हर खाने का मामला चर्चा का विषय बन गया है। जानकारी के अनुसार, सिंचाई विभाग में लिपिक के पद पर तैनात मोहित चौधरी को इस बार विधानसभा कैंट क्षेत्र में बीएलओ के रूप में नियुक्त किया गया था। पिता की मृत्यु के बाद मृतक आश्रित के तहत उन्हें नौकरी मिली थी और पहली बार उन्हें बीएलओ का दायित्व सौंपा गया था।

घटना कैसे हुई?
मंगलवार को मोहित पल्लवपुरम क्षेत्र में बूथ नंबर 18 पर गणना प्रपत्र (फॉर्म) जमा करने की प्रक्रिया में लगे हुए थे। परिजनों के अनुसार, इसी दौरान उन्होंने अचानक जहरीला पदार्थ खा लिया। जैसे ही सहकर्मियों और स्थानीय लोगों को स्थिति की जानकारी मिली, उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया। Doctors ने बताया कि हालत गंभीर है और फिलहाल वह बयान देने की स्थिति में नहीं हैं।

पत्नी का आरोप—“दबाव, धमकियाँ और कोई ट्रेनिंग नहीं”
मोहित चौधरी की पत्नी ने आरोप लगाया कि उनके पति कई दिनों से मानसिक रूप से दबाव में थे। बताया गया कि:
- उन्हें बिना उचित ट्रेनिंग के बीएलओ का काम सौंप दिया गया।
- बार-बार फॉर्म जमा करने को कहा जाता, लेकिन गलती बताकर उन्हें फिर से सुधारने के लिए कहा जाता।
- कथित तौर पर उनके सुपरवाइजर आशीष शर्मा द्वारा फटकार और धमकियाँ दी जाती थीं, जैसे—
“फॉर्म जल्दी जमा करो, नहीं तो सस्पेंड कर दूँगा। कार्यवाही करूँगा। एफआईआर भी हो सकती है।” - लगातार इस तनाव में मोहित ठीक से सो भी नहीं पा रहे थे। देर रात लौटना और सुबह जल्दी जाना उनकी दिनचर्या बन गई थी।
पत्नी का कहना है कि दबाव और धमकी के कारण वह डिप्रेशन में चले गए और अंततः मजबूरी में उन्होंने ज़हर खा लिया।

अस्पताल में हंगामा और सवालों की बौछार
घटना की जानकारी मिलते ही बड़ी संख्या में परिजन और स्थानीय लोग अस्पताल पहुंच गए और अधिकारियों के खिलाफ नाराज़गी जताई। लोगों ने आरोप लगाया कि बीएलओ पर काम का बोझ इतना बढ़ा दिया गया है कि कई कर्मचारी तनाव में हैं। कुछ लोगों ने कहा कि यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि दबाव के कारण पहले भी कई बीएलओ मानसिक तनाव से गुजर चुके हैं।
एडीएम प्रशासन सत्य प्रकाश सिंह ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा – “शाम को जानकारी मिली कि हमारे बीएलओ ने ज़हर खाया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि समीक्षा ज्यादा की जा रही थी। मरीज अभी बोलने की स्थिति में नहीं हैं। काम का प्रेशर सब पर होता है, यह चुनाव आयोग की गाइडलाइन के अनुसार ही कराया जाता है। यदि वह खुद कहेंगे कि उनके साथ गलत हुआ है, तो निश्चित रूप से कार्यवाई होगी।” उनका कहना है कि बिना जांच के किसी अधिकारी पर सीधे आरोप तय नहीं किए जा सकते, लेकिन अगर कर्मचारी के बयान में दबाव या धमकी की पुष्टि होती है तो सख्त कार्यवाई की जाएगी।

क्या उठते हैं बड़े सवाल?
यह घटना कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है:
- क्या बीएलओ को पर्याप्त ट्रेनिंग दी जाती है?
- क्या निर्धारित समयसीमा यथार्थवादी है?
- क्या सुपरविजन का तरीका कर्मचारियों पर अनावश्यक मानसिक दबाव बना देता है?
- क्या चुनाव आयोग को जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की हालत पर ध्यान देना चाहिए?
इन सवालों का जवाब तलाशना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी दुखद घटनाओं को रोका जा सके।