रिपोर्ट :- खुशबू मिश्रा
उत्तर प्रदेश में अब ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों को इलाज के लिए बड़े मेडिकल कॉलेज या चिकित्सा संस्थानों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करते हुए जिला अस्पतालों में ही ब्रेन स्ट्रोक का त्वरित इलाज उपलब्ध कराने की तैयारी कर रही है। लखनऊ स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज से जुड़े पायलट प्रोजेक्ट की सफलता के बाद इस सुविधा को पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा।
ब्रेन स्ट्रोक एक ऐसी गंभीर बीमारी है, जिसमें समय पर इलाज न मिलने पर मरीज की जान जा सकती है या वह जीवन भर के लिए लकवे जैसी गंभीर स्थिति का शिकार हो सकता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने प्रदेश में “हब एंड स्पोक मॉडल” के तहत ब्रेन स्ट्रोक के इलाज की व्यवस्था शुरू करने का निर्णय लिया है।

इस योजना के अंतर्गत प्रदेश के सभी जिला अस्पतालों को बड़े चिकित्सा संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों से जोड़ा जाएगा। केजीएमयू, एसजीपीजीआई, डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट, रिम्स सैफई, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज कानपुर, एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा, मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज प्रयागराज, लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज मेरठ, रानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज झांसी और बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर को “हब” के रूप में विकसित किया जाएगा। वहीं जिला अस्पताल “स्पोक” के रूप में कार्य करेंगे।
स्वास्थ्य विभाग इससे पहले हार्ट अटैक के मरीजों के लिए स्टेमी केयर नेटवर्क शुरू कर चुका है, जिसके तहत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) स्तर पर ही इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। इसी तर्ज पर अब ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों को भी जिला अस्पतालों में ही जरूरी इलाज देने की व्यवस्था की जा रही है।

इस योजना के तहत यदि ब्रेन स्ट्रोक के लक्षणों वाला मरीज चार घंटे के भीतर जिला अस्पताल पहुंच जाता है, तो उसकी जान बचाने की संभावना काफी बढ़ जाएगी। जिला अस्पताल में मरीज का तुरंत सीटी स्कैन किया जाएगा और उसकी रिपोर्ट मेडिकल कॉलेजों के न्यूरोलॉजिस्ट के व्हाट्सएप ग्रुप पर भेजी जाएगी। न्यूरोलॉजिस्ट सीटी स्कैन देखकर यह तय करेंगे कि मरीज को मस्तिष्क में बने खून के थक्के को गलाने वाला इंजेक्शन (थ्रोम्बोलाइसिस) दिया जाए या नहीं। समय रहते यह इंजेक्शन लगने से मरीज को लकवा या अन्य गंभीर जटिलताओं से बचाया जा सकेगा।

डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट के साथ अयोध्या, बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव, हरदोई, बस्ती और गोंडा के जिला व संयुक्त चिकित्सालयों को जोड़कर एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया। बीते चार महीनों में इस परियोजना के तहत 844 मरीजों के इलाज के लिए विशेषज्ञों से संपर्क किया गया, जिनमें से सात मरीजों को खून का थक्का गलाने वाले इंजेक्शन की आवश्यकता पड़ी और समय पर इलाज से उन्हें गंभीर स्थिति में पहुंचने से बचा लिया गया।
महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य डॉ. रतन पाल सिंह सुमन के अनुसार, इस सुविधा को प्रभावी बनाने के लिए जिला अस्पतालों में डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल कर्मियों को ब्रेन स्ट्रोक के लक्षण पहचानने और प्राथमिक इलाज का विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद चरणबद्ध तरीके से सभी जिला अस्पतालों में यह सुविधा शुरू की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य फरवरी तक प्रदेश के सभी जिलों में इस सेवा को शुरू करना है।