उरई के मनोरी गांव में श्मशान घाट बदहाली का शिकार, ग्रामीण नदी किनारे अंतिम संस्कार को मजबूर, विकास के दावों की खुली पोल!

जालौन!
एक ओर सरकार ग्रामीण विकास और बुनियादी सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं उरई के समीपवर्ती ग्राम पंचायत मनोरी, कैथी और बरसेठी की सच्चाई इन दावों की पोल खोल रही है!
ग्रामीण आज भी अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं!
स्थिति यह है कि गांव में श्मशान घाट की भूमि तो आवंटित है, लेकिन वहां फैली गंदगी, झाड़ियां और अव्यवस्था के कारण अंतिम संस्कार करना बेहद कठिन हो गया है!
ग्रामीणों को शव कंधे पर ढोकर लाना पड़ता है और रास्ते में बार-बार नीचे रखना मजबूरी बन चुका है!
ग्रामीणों का आरोप है कि मरघट की जमीन होने के बावजूद प्रशासन और ग्राम प्रधान की ओर से कोई सुनवाई नहीं हो रही है!
इस लापरवाही के चलते ग्रामीण शवों का अंतिम संस्कार नदी किनारे डरौटी या अन्य असुरक्षित स्थानों पर करने को विवश हैं!

गांव निवासी बलराम ने बताया कि कुछ समय पूर्व उनके छोटे भाई की मृत्यु हो गई थी और बारिश के मौसम में श्मशान घाट न होने के कारण नदी किनारे अंतिम संस्कार करना पड़ा था!
उस समय ग्राम प्रधान द्वारा मरघट बनवाने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन आज तक कोई कार्य नहीं हुआ है!
ग्रामीणों ने बताया कि ग्राम प्रधान राधा देवी उरई में निवास करती हैं और पिछले पांच वर्षों में एक बार भी गांव नहीं आई हैं!
उनके प्रतिनिधि शिवराम भी समस्याओं को लेकर गंभीर नजर नहीं आते हैं!
विकास के नाम पर गांव में शून्य कार्य होने से ग्रामीणों में भारी रोष है!
ग्रामीणों का कहना है कि मूलभूत सुविधाओं के अभाव में उनका जीवन नारकीय हो गया है!
अब देखना यह होगा कि इस खबर के बाद शासन-प्रशासन जागता है या मनोरी के ग्रामीणों को बदहाली में ही जीना पड़ेगा!
जालौना से न्यूज़ टाइम नेशन के लिए अली जावेद की रिपोर्ट!