950 करोड़ के घोटाले पर हल्की सजा और बिना टिकट यात्रा पर कड़ी सजा ने न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या कानून सिर्फ कमजोरों के लिए है? पढ़िए यह तीखा विश्लेषण।
प्रतापगढ़ संवाददाता – दया शंकर पांडे
इंसाफ का मज़ाक या सिस्टम की सच्चाई—यह सवाल अब महज़ शब्द नहीं, बल्कि आम आदमी की वह चीख बन चुका है जो हर दिल में गूंज रही है!
950 करोड़ का घोटाला करने के बाद 3 साल की सजा और बिना टिकट यात्रा करने पर 5 साल की सजा, यह तुलना संविधान पर नहीं बल्कि सिस्टम की सोच पर बड़ा सवाल खड़ा करती है!
जब कानून का पलड़ा कमजोर के लिए भारी और ताकतवर के लिए हल्का हो जाए, तो भरोसा टूटना लाज़मी है!

आज गरीब की जेब खाली है, लेकिन उसके लिए कानून की जेब भरी हुई है, जबकि देश को लूटकर करोड़ों का मालिक बनने वालों के लिए सिस्टम नरम गद्दे बिछा देता है!
यही दोहरा मापदंड जनता को अंदर से तोड़ रहा है और गुस्सा धीरे-धीरे ज्वालामुखी बनता जा रहा है!
रेलवे स्टेशन से लेकर कोर्ट के गलियारों तक, हर जगह एक ही चर्चा है और लोग पूछ रहे हैं—क्या कानून सिर्फ आम आदमी को डराने के लिए बना है!
क्या बड़े लोगों के लिए अलग संविधान लिखा गया है, और क्या आम नागरिक सिर्फ सजा भुगतने के लिए पैदा हुआ है!
जब सवाल इतने गहरे हों, तो चुप रहना भी गुनाह बन जाता है!
समस्या यह नहीं कि कानून है, समस्या यह है कि उसका इस्तेमाल किसके खिलाफ होता है!
किताबों में तो सब बराबर हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत में बराबरी सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित है!
जब न्याय मज़ाक जैसा दिखने लगे, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं!
अब वक्त आ गया है कि हम आंखें खोलें, सवाल करें और सोचें!
क्योंकि खामोशी हमेशा ताकतवर का हथियार बनती है और नुकसान आम आदमी का ही होता है!
अगर आज नहीं जागे, तो कल शायद बोलने का हक भी न बचे—यही सबसे कड़वी सच्चाई है, जागो!