देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG 2026 एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। 3 मई 2026 को आयोजित हुई इस परीक्षा में देशभर से 22 लाख से अधिक छात्रों ने हिस्सा लिया था, लेकिन परीक्षा के महज नौ दिन बाद नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी NTA को पूरी परीक्षा रद्द करनी पड़ी। कारण बना कथित पेपर लीक, जिसने देशभर में लाखों छात्रों और अभिभावकों को चिंता में डाल दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी राष्ट्रीय परीक्षा का पेपर लीक कैसे हो जाता है?
मामले की शुरुआत तब हुई जब 7 मई को NTA को एक व्हिसलब्लोअर से सूचना मिली कि व्हाट्सऐप पर एक “गेस पेपर” वायरल हो रहा है। जांच में सामने आया कि उस पेपर के कई सवाल असली NEET परीक्षा से मेल खाते थे। इसके बाद एजेंसी ने पूरे मामले की जांच शुरू की और मामला पेपर लीक तक पहुंच गया। बढ़ते विवाद और छात्रों के विरोध को देखते हुए परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि NEET परीक्षा का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष उसका ऑफलाइन यानी “पेन और पेपर मोड” है। जहां JEE जैसी बड़ी परीक्षाएं अब कंप्यूटर आधारित और कई शिफ्टों में आयोजित की जाती हैं, वहीं NEET अब भी एक ही दिन और एक ही शिफ्ट में कराई जाती है। इसका मतलब यह है कि लाखों प्रश्नपत्रों को एक साथ छापना, पैक करना और देशभर के करीब 5500 परीक्षा केंद्रों तक सुरक्षित पहुंचाना पड़ता है। यही प्रक्रिया पेपर लीक का सबसे बड़ा जोखिम बन जाती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक जांच एजेंसियों को शक है कि इस बार कथित पेपर लीक राजस्थान से शुरू हुआ। माना जा रहा है कि प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने से पहले ही कुछ लोगों के हाथ लग गया। यानी सुरक्षा में सेंध ट्रांसपोर्टेशन या स्टोरेज के दौरान लगी हो सकती है।
हालांकि NTA का दावा है कि प्रश्नपत्र डिजिटल लॉक वाले विशेष बॉक्स में रखे जाते हैं और परीक्षा शुरू होने से 45 मिनट पहले ही खोले जाते हैं। लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी व्यवस्था में आउटसोर्सिंग सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। परीक्षा केंद्रों के संचालन से लेकर स्टाफ, निरीक्षक और लॉजिस्टिक्स तक, बड़ी संख्या में निजी एजेंसियों और बाहरी कर्मचारियों पर निर्भरता रहती है। ऐसे में किसी भी स्तर पर मिलीभगत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी राष्ट्रीय एजेंसी में स्थायी कर्मचारियों की संख्या बेहद कम बताई जाती है। रिपोर्ट्स के अनुसार दिसंबर 2024 तक NTA में केवल 22 स्थायी कर्मचारी थे, जबकि बाकी व्यवस्था संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के भरोसे चल रही थी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतनी छोटी स्थायी टीम देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं को सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से संचालित कर सकती है?
इस पूरे मामले का एक बड़ा आर्थिक पहलू भी सामने आता है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों और निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस में भारी अंतर है। जहां सरकारी कॉलेज में MBBS की पढ़ाई कुछ लाख रुपये में पूरी हो सकती है, वहीं निजी कॉलेजों में यही फीस करोड़ों तक पहुंच जाती है। यही वजह है कि कुछ लोग किसी भी कीमत पर सरकारी सीट हासिल करना चाहते हैं और इसी मांग ने पेपर माफियाओं के लिए बड़ा अवैध बाजार तैयार कर दिया है।
कोचिंग इंडस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया में शायद ही कहीं इतनी बड़ी ऑफलाइन परीक्षा एक ही दिन में आयोजित की जाती हो। लाखों छात्रों, हजारों केंद्रों और बड़ी संख्या में कर्मचारियों के बीच सुरक्षा बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है।
फिलहाल मामले की जांच CBI कर रही है और देशभर में कई गिरफ्तारियां भी हो चुकी हैं। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर भारत की परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा है और अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था में बड़े बदलाव किए जाएंगे या नहीं।